“अमेरिका ने महीनों तक भारत पर रूसी तेल खरीदने के लिए दबाव बनाया और 25% टैरिफ थोपे, लेकिन ईरान युद्ध के कारण ग्लोबल सप्लाई चेन बाधित होने पर अब वही अमेरिका 30 दिनों का वेवर देकर भारत को रूसी क्रूड खरीदने की अनुमति दे रहा है। भारतीय रिफाइनर्स ने वेवर मिलते ही 3 करोड़ बैरल से ज्यादा रूसी तेल खरीद लिया है, जबकि ईरान के विदेश मंत्री ने अमेरिका के इस यू-टर्न को ‘भीख मांगना’ करार दिया है।”
अमेरिका का यू-टर्न: रूस से तेल खरीद पर भारत को 30 दिन का वेवर
अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने हाल ही में भारत को 30 दिनों का विशेष वेवर जारी किया है, जिसके तहत भारतीय रिफाइनर्स रूसी क्रूड ऑयल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स खरीद सकते हैं जो पहले से जहाजों पर लोडेड हैं। यह वेवर 5 मार्च 2026 को लोडेड ऑयल पर लागू है और 4 अप्रैल तक वैध रहेगा। ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने इसे ‘स्टॉपगैप मेजर’ बताया है, जिसका उद्देश्य ग्लोबल मार्केट में ऑयल फ्लो बनाए रखना है।
ईरान के साथ चल रहे युद्ध (US-Israel vs Iran) के कारण मिडिल ईस्ट से सप्लाई प्रभावित हुई है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते में खतरा बढ़ने से इराक, सऊदी अरब, UAE, कुवैत और कतर से आने वाले क्रूड में कमी आई है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऑयल इंपोर्टर है और इसकी 90% जरूरत आयात पर निर्भर है। ऐसे में रूसी ऑयल एक त्वरित विकल्प बन गया।
वेवर मिलने के बाद इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC), रिलायंस इंडस्ट्रीज समेत प्रमुख रिफाइनर्स ने स्पॉट मार्केट से करीब 3 करोड़ बैरल (30 मिलियन बैरल) रूसी क्रूड खरीद लिया। ये कार्गो ज्यादातर एशियाई वाटर्स में थे और पहले अनकमिटेड थे। इससे भारत को तत्काल राहत मिली है, क्योंकि मिडिल ईस्ट से आने वाले सप्लाई में 50% तक की कमी का अनुमान था।
पहले दबाव, अब अपील: अमेरिका की नीति में बड़ा बदलाव
2025 के अंत और 2026 की शुरुआत में अमेरिका ने भारत पर रूसी ऑयल खरीद रोकने के लिए भारी दबाव बनाया था। ट्रंप प्रशासन ने 25% पेनल्टी टैरिफ लगाए थे और भारत को अमेरिकी क्रूड ज्यादा खरीदने के लिए राजी किया था। फरवरी 2026 में रूसी क्रूड की हिस्सेदारी भारत के कुल इंपोर्ट में 20% तक गिर गई थी। लेकिन ईरान युद्ध शुरू होने के बाद ग्लोबल ऑयल प्राइस बढ़कर 87 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गए।
अब अमेरिका ने न केवल भारत बल्कि सभी देशों के लिए रूसी ऑयल (खासकर स्ट्रैंडेड कार्गो) की खरीद की अनुमति दी है। बेसेंट ने कहा कि यह कदम ग्लोबल सप्लाई बढ़ाने के लिए है और रूस को ज्यादा फायदा नहीं होगा क्योंकि यह पहले से लोडेड ऑयल है। लेकिन यह यू-टर्न साफ दिखाता है कि जियोपॉलिटिकल जरूरतों ने सैंक्शंस को पीछे धकेल दिया है।
ईरान की तीखी प्रतिक्रिया: ‘व्हाइट हाउस अब भीख मांग रहा’
ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने अमेरिका के इस रुख पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने X पर पोस्ट किया कि अमेरिका ने महीनों तक भारत को रूसी ऑयल खरीद से रोकने के लिए धमकाया, लेकिन ईरान के साथ दो हफ्ते के युद्ध के बाद अब व्हाइट हाउस दुनिया से – खासकर भारत से – रूसी क्रूड खरीदने की ‘भीख’ मांग रहा है।
अराघची ने यूरोपीय देशों पर भी निशाना साधा कि वे ईरान के खिलाफ ‘अवैध युद्ध’ में अमेरिका का साथ दे रहे हैं, लेकिन रूस के मामले में अमेरिकी मदद की उम्मीद कर रहे थे। ईरान का दावा है कि यह यू-टर्न मॉस्को की एनर्जी रेवेन्यू को बढ़ावा देगा और ग्लोबल एनर्जी को ‘हॉस्टेज’ बनाने की कोशिश को उजागर करता है।
भारत की स्थिति: एनर्जी सिक्योरिटी प्राथमिकता
भारतीय सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह किसी देश की ‘परमिशन’ पर निर्भर नहीं है। फरवरी 2026 में भी रूस भारत का सबसे बड़ा क्रूड सप्लायर बना रहा। सरकार का कहना है कि 1.4 अरब लोगों की एनर्जी सिक्योरिटी सबसे ऊपर है। होर्मुज रूट पर तनाव के बावजूद भारत ने सप्लाई चेन को स्थिर रखा है और डिस्काउंटेड रूसी ऑयल से फायदा उठाया है।
प्रमुख आंकड़े एक नजर में
रूसी क्रूड खरीद (वेवर के बाद): 30 मिलियन बैरल+
भारत का कुल ऑयल इंपोर्ट निर्भरता: 90%
फरवरी 2026 में रूस की हिस्सेदारी: 20%
ग्लोबल स्ट्रैंडेड रूसी ऑयल: 124 मिलियन बैरल (अनुमानित)
ऑयल प्राइस (हालिया): ~87 डॉलर/बैरल
यह घटनाक्रम दिखाता है कि जियोपॉलिटिकल संकट कैसे एनर्जी पॉलिसी को प्रभावित करते हैं। भारत जैसे बड़े इंपोर्टर के लिए विविध स्रोत महत्वपूर्ण हैं।
Disclaimer: यह एक न्यूज रिपोर्ट है। इसमें दी गई जानकारी उपलब्ध डेटा और घटनाओं पर आधारित है।


