अमेरिका और इज़राइल के संयुक्त हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद शुरू हुए पूर्ण युद्ध ने मध्य पूर्व को अस्थिर कर दिया है। भारत की रणनीतिक महत्वाकांक्षा चाबहार पोर्ट अब गंभीर खतरे में है, जहां $120 मिलियन से अधिक का निवेश पहले ही किया जा चुका है। अदाणी पोर्ट्स जैसे भारतीय कंपनियों के लिए क्षेत्रीय अस्थिरता से परिचालन जोखिम बढ़ गया है, जबकि हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव से वैश्विक शिपिंग और भारत की ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि पूर्ण युद्ध की स्थिति में चाबहार परियोजना पर 30-50% तक का प्रत्यक्ष नुकसान संभव है, जिसमें उपकरण क्षति, व्यापार रुकावट और सैंक्शंस शामिल हैं।
अमेरिका-ईरान युद्ध: क्या डूब जाएगा अदाणी पोर्ट्स का निवेश, चाबहार पर कितना हो सकता है नुकसान
अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर बड़े पैमाने पर हमले शुरू होने के बाद स्थिति अब युद्ध में बदल चुकी है। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत की पुष्टि के साथ तेहरान ने जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी है, जिसमें गल्फ देशों में अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल हमले शामिल हैं। इस संघर्ष का सीधा असर भारत के चाबहार पोर्ट पर पड़ रहा है, जो अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच के लिए भारत की प्रमुख रणनीतिक संपत्ति है।
चाबहार पोर्ट का शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल भारत द्वारा संचालित है, जहां 2024 में 10 साल के समझौते के तहत भारत पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) ने $120 मिलियन का निवेश किया था। यह राशि उपकरण, क्रेन और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास में लगाई गई, जिसमें $250 मिलियन की क्रेडिट लाइन भी शामिल थी। 2026 की शुरुआत तक यह राशि पूरी तरह चुकाई जा चुकी है, लेकिन नए युद्ध ने परियोजना को अनिश्चितता में डाल दिया है।
अदाणी पोर्ट्स का सीधा निवेश चाबहार में नहीं है, लेकिन कंपनी की वैश्विक पोर्ट रणनीति में मध्य पूर्व महत्वपूर्ण है। अदाणी ने इज़राइल के हाइफा पोर्ट में 70% हिस्सेदारी ली हुई है, जहां अब क्षेत्रीय तनाव से ऑपरेशन प्रभावित हो सकते हैं। कंपनी ने हाइफा में स्टाफ की सुरक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर की निरंतरता की पुष्टि की है, लेकिन ईरान के साथ युद्ध बढ़ने पर शिपिंग रूट्स बाधित हो सकते हैं। चाबहार भारत के लिए पाकिस्तान को बायपास करके अफगानिस्तान तक व्यापार का वैकल्पिक रास्ता प्रदान करता है। पोर्ट की क्षमता वर्तमान में 8.5 मिलियन टन है, जिसे भविष्य में 86 मिलियन टन तक बढ़ाने की योजना थी।
युद्ध के कारण संभावित नुकसान:
प्रत्यक्ष क्षति : हॉर्मुज जलडमरूमध्य में युद्ध फैलने पर शिपिंग रुक सकती है। चाबहार गल्फ ऑफ ओमान पर है, लेकिन निकटवर्ती क्षेत्रों में हमले से क्रेन, गोदाम और उपकरण क्षतिग्रस्त हो सकते हैं। अनुमानित नुकसान 20-40% इंफ्रास्ट्रक्चर वैल्यू का हो सकता है।
व्यापार रुकावट : भारत-ईरान-अफगानिस्तान व्यापार प्रभावित होगा। 2025 में चाबहार से अफगानिस्तान को गेहूं और अन्य सामग्री का निर्यात हुआ था, लेकिन अब जहाजों का बीमा प्रीमियम 5-10 गुना बढ़ सकता है।
सैंक्शंस का जोखिम : अमेरिका ने पहले चाबहार के लिए अप्रैल 2026 तक छूट दी थी, लेकिन युद्ध के बाद यह समाप्त हो सकती है। भारतीय कंपनियां सेकेंडरी सैंक्शंस का सामना कर सकती हैं, जिससे वैश्विक बैंकिंग और व्यापार प्रभावित होगा।
अदाणी पोर्ट्स पर असर : हालांकि अदाणी का चाबहार में प्रत्यक्ष निवेश नहीं है, लेकिन मध्य पूर्व में अस्थिरता से कंपनी के अन्य एसेट्स जैसे हाइफा प्रभावित होंगे। अदाणी की कुल पोर्ट क्षमता भारत में मजबूत है, लेकिन वैश्विक विस्तार में मध्य पूर्व की अस्थिरता जोखिम बढ़ाती है।
भारत सरकार ने 2026 बजट में चाबहार के लिए कोई नई राशि नहीं रखी, जो अमेरिकी दबाव को दर्शाता है। विदेश मंत्रालय ने अमेरिका से छूट बढ़ाने की बातचीत जारी रखी है, लेकिन युद्ध ने स्थिति जटिल कर दी है। ईरानी राजदूत ने चाबहार को दोनों देशों के बीच सहयोग का प्रतीक बताया था, लेकिन अब क्षेत्रीय युद्ध ने इसे खतरे में डाल दिया है।
युद्ध के विस्तार से भारत की ऊर्जा आयात भी प्रभावित हो सकता है, क्योंकि हॉर्मुज से 20% वैश्विक तेल गुजरता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संघर्ष लंबा चला तो चाबहार परियोजना पर कुल नुकसान $200-300 मिलियन तक पहुंच सकता है, जिसमें अप्रत्यक्ष प्रभाव जैसे व्यापार हानि और निवेश वापसी शामिल है। भारत अब वैकल्पिक रणनीतियों पर विचार कर रहा है, लेकिन चाबहार की रणनीतिक महत्वपूर्णता इसे छोड़ना मुश्किल बनाती है।
डिस्क्लेमर : यह लेख समाचार, विश्लेषण और उपलब्ध जानकारी पर आधारित है। निवेश संबंधी निर्णय व्यक्तिगत जोखिम पर लें।


