“आरसी भार्गव, जिन्हें ‘मारुति मैन’ कहा जाता है, ने 1956 बैच में UPSC टॉप करके IAS जॉइन की, लेकिन 1981 में मारुति उद्योग लिमिटेड में डेपुटेशन पर आने के बाद सरकार की एक नहीं सुनी। उन्होंने प्रतिष्ठित सिविल सर्विस छोड़कर मात्र 2250 रुपये मासिक वेतन वाली नौकरी चुनी और Maruti Suzuki को भारत का सबसे बड़ा ऑटोमोबाइल ब्रांड बनाया, जो आज 2.60 लाख करोड़ रुपये से अधिक की कंपनी है। उनकी दूरदर्शिता, जोखिम लेने की क्षमता और जापानी पार्टनरशिप ने भारतीय मिडिल क्लास को कार सपनों को हकीकत में बदला।”
आरसी भार्गव: एक साहसी निर्णय की कहानी
आरसी भार्गव का जन्म 30 जुलाई 1934 को हुआ था। उन्होंने दून स्कूल से पढ़ाई की और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मैथमेटिक्स में एमएससी किया, जहां वे टॉपर रहे। इसके बाद उन्होंने अमेरिका के विलियम्स कॉलेज से डेवलपमेंटल इकोनॉमिक्स में मास्टर्स पूरा किया। 1956 में UPSC परीक्षा में पहले स्थान पर रहकर उन्होंने IAS जॉइन की और उत्तर प्रदेश कैडर मिला।
IAS में उन्होंने 25 साल तक विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर काम किया, जिसमें BHEL में कमर्शियल डायरेक्टर के रूप में सेवा शामिल है। 1980 के दशक की शुरुआत में भारत सरकार ने छोटी, किफायती कार बनाने के लिए Maruti Udyog Limited की स्थापना की। यह एक पब्लिक सेक्टर कंपनी थी, जिसका उद्देश्य आम भारतीय को कार उपलब्ध कराना था।
1981 में भार्गव को मारुति में एक साल के लिए डेपुटेशन पर भेजा गया। वे कंपनी के तीसरे कर्मचारी बने। उस समय कंपनी में V Krishnamurthy चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर थे। भार्गव को मार्केटिंग और सेल्स का जिम्मा मिला। उन्होंने जापानी कंपनी Suzuki के साथ टाई-अप को अंतिम रूप देने में अहम भूमिका निभाई। Osamu Suzuki के साथ बातचीत में उनकी कुशलता ने पार्टनरशिप को सफल बनाया।
सरकार ने डेपुटेशन एक साल बाद बढ़ाने से इनकार कर दिया। उस समय भार्गव के पास दो विकल्प थे – सरकारी सेवा में वापस लौटना या मारुति में रहना। उन्होंने सरकार की एक नहीं सुनी और IAS से इस्तीफा दे दिया। मारुति में उन्हें शुरुआती वेतन मात्र 2250 रुपये मासिक मिला, जो IAS सैलरी से काफी कम था। यह निर्णय उनके करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।
Maruti Suzuki की सफलता में भार्गव की भूमिका
IAS छोड़ने के बाद भार्गव ने मारुति को पूरी तरह से समर्पित कर दिया। 1983 में पहली कार Maruti 800 लॉन्च हुई, जिसने भारतीय ऑटोमोबाइल मार्केट को बदल दिया। उस समय कारें महंगी और आयातित होती थीं, लेकिन Maruti 800 ने किफायती कीमत पर बेहतर माइलेज और फीचर्स दिए। भार्गव ने मार्केटिंग स्ट्रैटेजी बनाई, जिसमें ग्राहक सेवा, डीलर नेटवर्क और सर्विस सेंटर पर फोकस था।
उन्होंने कंपनी को सरकारी नियंत्रण से निकालकर प्रोफेशनल मैनेजमेंट की ओर ले गए। 1980 के अंत और 1990 के दशक में Suzuki ने कंपनी में बहुमत हिस्सेदारी ली, जिसके बाद Maruti Suzuki India Limited बनी। भार्गव ने इस ट्रांजिशन को सुचारू रूप से हैंडल किया। वे 1990 के दशक में CEO बने और बाद में चेयरमैन।
उनकी लीडरशिप में कंपनी ने उत्पादन बढ़ाया, नए मॉडल लॉन्च किए जैसे Alto, WagonR, Swift, Dzire। आज Maruti Suzuki भारत में पैसेंजर व्हीकल मार्केट में 40% से अधिक शेयर रखती है। कंपनी का मार्केट कैपिटलाइजेशन 4 लाख करोड़ रुपये के आसपास पहुंच चुका है और यह Suzuki Motor Corporation की सबसे बड़ी सब्सिडियरी है।
भार्गव के प्रमुख योगदान
कस्टमर फोकस : उन्होंने भारतीय ग्राहकों की जरूरतों को समझा और छोटी, फ्यूल एफिशिएंट कारें दीं।
सप्लाई चेन : लोकल पार्ट्स मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा दिया, जिससे लागत कम हुई।
डीलर नेटवर्क : देशभर में मजबूत नेटवर्क बनाया, जो आज भी कंपनी की ताकत है।
एक्सपोर्ट : Maruti Suzuki को एक्सपोर्ट हब बनाया, खासकर लैटिन अमेरिका और अफ्रीका में।
EV और फ्यूचर : हाल के वर्षों में CNG, हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक व्हीकल पर फोकस बढ़ाया।
व्यक्तिगत जीवन और सम्मान
आरसी भार्गव लाइमलाइट से दूर रहते हैं। उन्होंने ‘The Maruti Story: How a Public Sector Company Put India on Wheels’ किताब लिखी, जिसमें कंपनी की जर्नी बताई गई है। उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया है। 91 साल की उम्र में भी वे Maruti Suzuki के चेयरमैन बने हुए हैं और कंपनी के लिए ट्रबलशूटर की भूमिका निभाते हैं।
उनका फैसला आज भी लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है कि कभी-कभी सरकारी सुरक्षा छोड़कर पैशन फॉलो करने से बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। मारुति आज सिर्फ एक ब्रांड नहीं, बल्कि भारतीय मिडिल क्लास की पहचान है – और इसके पीछे ‘मारुति मैन’ आरसी भार्गव का हाथ है।


