“IRDAI जीवन बीमा एजेंटों के लिए पहले साल के भारी कमीशन को खत्म करने पर विचार कर रहा है। कमीशन को पॉलिसी की पूरी अवधि में समान रूप से बांटा जा सकता है, जिससे मिस-सेलिंग कम होगी, पॉलिसी की पर्सिस्टेंसी बढ़ेगी और ग्राहकों के लिए प्रीमियम में कमी आ सकती है। FY25 में कमीशन पेआउट्स 18% बढ़कर ₹60,800 करोड़ पहुंच गए, जो प्रीमियम वृद्धि से तेज था। नए नियम 2026 में लागू हो सकते हैं।”
बीमा नियामक IRDAI अब कमीशन संरचना में बड़े सुधार लाने की तैयारी में है, जिसका असर लाखों ग्राहकों और एजेंटों पर पड़ सकता है। मुख्य फोकस जीवन बीमा क्षेत्र पर है, जहां पहले साल में एजेंटों को मिलने वाला भारी upfront कमीशन (अक्सर 30-40% तक) मिस-सेलिंग का बड़ा कारण माना जाता है। IRDAI अब इस मॉडल को बदलकर कमीशन को पॉलिसी टर्म के दौरान लेवल (समान) करने पर विचार कर रहा है।
इस बदलाव से एजेंटों की आय का बड़ा हिस्सा पहले साल से हट जाएगा और इसे 3-5 सालों में फैलाया जा सकता है। उदाहरण के लिए, इंडिविजुअल एजेंटों के लिए 3 साल और कॉर्पोरेट एजेंटों के लिए 5 साल तक कमीशन डिफर्ड (स्थगित) किया जा सकता है। इसका मतलब है कि एजेंट को तब तक फुल पेमेंट मिलेगा, जब तक पॉलिसी एक्टिव रहेगी और कैंसल या सरेंडर नहीं होगी।
यह बदलाव इसलिए जरूरी हो गया है क्योंकि FY25 में जीवन बीमा कंपनियों ने एजेंटों और इंटरमीडियरीज को कुल ₹60,800 करोड़ कमीशन दिए, जो पिछले साल से 18% ज्यादा है। यह वृद्धि प्रीमियम कलेक्शन से कहीं तेज रही, जिससे डिस्ट्रीब्यूशन कॉस्ट बढ़ गई और कई कंपनियां एक्सपेंस ऑफ मैनेजमेंट (EoM) लिमिट ब्रेक कर गईं।
IRDAI चेयरमैन अजय सेठ ने हाल ही में कहा कि नए कमीशन नियमों पर काम चल रहा है और जल्द ही कंसल्टेटिव पेपर जारी किया जाएगा। इसमें कोई सरप्राइज नहीं होगा, बल्कि इंडस्ट्री की राय ली जाएगी। Insurance Amendment Act, 2025 के तहत IRDAI को अब कमीशन, रेमुनरेशन और रिवार्ड्स पर सीधे लिमिट सेट करने का अधिकार मिल गया है। इससे पहले यह कंपनियों के विवेक पर था, लेकिन अब रेगुलेटर तय करेगा।
मुख्य प्रस्तावित बदलाव
Upfront कमीशन खत्म या काफी कम : पहले साल का 35-50% कमीशन अब नहीं मिलेगा।
लेवल कमीशन सिस्टम : पूरी पॉलिसी टर्म (जैसे 10-20 साल) में कमीशन बराबर बंटेगा।
डिफर्ड पेमेंट : एजेंट को कमीशन तब मिलेगा, जब पॉलिसी जारी रहेगी। इससे पर्सिस्टेंसी रेशियो (पॉलिसी जारी रखने की दर) बढ़ेगी।
EoM पर सख्ती : कुल मैनेजमेंट एक्सपेंस में कमीशन शामिल कर टाइट कंट्रोल। म्यूचुअल फंड्स की तरह TER जैसी लिमिट लग सकती है।
मिस-सेलिंग पर लगाम : क्विक पेआउट के चक्कर में गलत पॉलिसी बेचने की प्रवृत्ति कम होगी।
ग्राहकों पर क्या असर?
ये बदलाव ग्राहकों के लिए फायदेमंद साबित हो सकते हैं। डिस्ट्रीब्यूशन कॉस्ट कम होने से इंश्योरेंस कंपनियां प्रीमियम रेट्स घटा सकती हैं या बेहतर बेनिफिट्स दे सकती हैं। खासकर टर्म इंश्योरेंस और यूनिट लिंक्ड प्लान्स (ULIP) में प्रीमियम 5-10% तक सस्ता हो सकता है। साथ ही, पॉलिसी सरेंडर या लैप्स कम होंगी, क्योंकि एजेंट ग्राहक को लंबे समय तक सर्विस देंगे।
हालांकि, शॉर्ट टर्म में एजेंटों की आय प्रभावित होगी। कई एजेंट पहले साल के कमीशन पर निर्भर हैं, इसलिए इंडस्ट्री में रेसिस्टेंस है। लेकिन लंबे समय में यह सस्टेनेबल मॉडल बनेगा, जहां एजेंट रिन्यूअल और सर्विस पर फोकस करेंगे।
इंडस्ट्री की तैयारी
जीवन बीमा कंपनियां पहले से ही नए एजेंट इंसेंटिव स्ट्रक्चर पर काम कर रही हैं। कुछ कंपनियां डिजिटल इंटरमीडियरीज और डायरेक्ट चैनल को बढ़ावा दे रही हैं, जहां कमीशन कम होता है। IRDAI का लक्ष्य है कि कुल एक्विजिशन कॉस्ट घटे और ग्राहक सेंट्रिक अप्रोच मजबूत हो।
ये सुधार अगले 6 महीनों में रोलआउट हो सकते हैं, जिसमें ड्राफ्ट नियम जारी होने के बाद इंडस्ट्री फीडबैक लिया जाएगा। अप्रैल 2026 से नए नियम लागू होने की संभावना है।


