भारत में GPS सिस्टम की कमजोरी और स्टार्टअप्स द्वारा विकसित अल्टरनेटिव टेक्नोलॉजी जैसे NavIC और LEO सैटेलाइट्स का ग्राफिक इलस्ट्रेशन

GPS सिस्टम पड़ता जा रहा कमजोर, बड़े स्टार्टअप्स इसके अल्टरनेटिव्स पर कर रहे काम; इन 3 टेक्नोलॉजी पर फोकस

“हाल के वर्षों में भारत के प्रमुख एयरपोर्ट्स पर GPS jamming और spoofing की घटनाएं बढ़ी हैं, जिससे नेविगेशन सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं। बड़े स्टार्टअप्स अब NavIC, LEO-based PNT और anti-jamming टेक्नोलॉजी पर फोकस कर रहे हैं ताकि स्वदेशी और सुरक्षित विकल्प तैयार हो सकें।”

भारत में GPS सिग्नल की कमजोरी अब एक गंभीर चुनौती बन चुकी है। पिछले दो वर्षों में नवंबर 2023 से नवंबर 2025 तक 1,951 से अधिक एयरक्राफ्ट GPS interference की घटनाएं दर्ज की गई हैं। दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट सहित मुंबई, कोलकाता, हैदराबाद, बेंगलुरु, चेन्नई और अमृतसर जैसे आठ प्रमुख एयरपोर्ट्स पर नियमित रूप से jamming और spoofing की रिपोर्ट्स आ रही हैं। ये घटनाएं 2023 से जारी हैं और हाल ही में संसद में सिविल एविएशन मिनिस्टर ने इनकी पुष्टि की है।

Spoofing में फेक सिग्नल भेजकर एयरक्राफ्ट को गलत पोजीशन दिखाई जाती है, जबकि jamming असली सिग्नल को ब्लॉक कर देता है। इससे लैंडिंग प्रक्रिया में गड़बड़ी, फॉल्स अलर्ट और कभी-कभी फ्लाइट डायवर्शन तक की नौबत आ जाती है। दिल्ली एयरपोर्ट के आसपास नवंबर 2025 में कई मामलों में पायलट्स को GNSS spoofing का सामना करना पड़ा, जहां पोजीशन डेटा और एल्टीट्यूड में एरर दर्ज हुए। ग्लोबल स्तर पर भी GPS interference 2022 से 2025 तक दोगुना से अधिक बढ़ा है, जहां प्रति 1,000 फ्लाइट्स पर 59 घटनाएं रिपोर्ट हुईं।

भारत में यह समस्या बॉर्डर एरिया से अब इनलैंड शहरों तक फैल रही है। जियोपॉलिटिकल टेंशन के कारण jamming आसान और सस्ता हो गया है, जिससे सिविल एविएशन, लॉजिस्टिक्स, ऑटोनॉमस व्हीकल्स और स्मार्टफोन नेविगेशन प्रभावित हो रहे हैं।

इस चुनौती से निपटने के लिए भारतीय स्टार्टअप्स तेजी से अल्टरनेटिव टेक्नोलॉजी विकसित कर रहे हैं। तीन प्रमुख क्षेत्रों पर फोकस है:

NavIC का अपग्रेड और इंटीग्रेशन ISRO का NavIC (Navigation with Indian Constellation) भारत का क्षेत्रीय GNSS सिस्टम है, जो भारत और 1,500 किमी तक के आसपास के इलाकों में सटीक पोजीशनिंग देता है। यह GPS पर निर्भरता कम करने के लिए महत्वपूर्ण है। कई भारतीय नेविगेशन ऐप्स और डिवाइसेज अब ड्यूल-मोड (GPS + NavIC) सपोर्ट कर रहे हैं। स्टार्टअप्स NavIC सिग्नल को मजबूत बनाने और मल्टी-कॉन्स्टेलेशन रिसीवर विकसित करने पर काम कर रहे हैं, ताकि spoofing या jamming के दौरान ऑटोमैटिक स्विचओवर हो सके। NavIC पहले से ही नेवी, डिजास्टर मैनेजमेंट और फिशिंग वेसल ट्रैकिंग में इस्तेमाल हो रहा है।

LEO-based PNT सिस्टम लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) सैटेलाइट्स पारंपरिक GNSS से ज्यादा मजबूत सिग्नल देते हैं क्योंकि ये करीब (500-1,200 किमी) होते हैं। Chennai-based VyomIC स्टार्टअप, जो IIT Madras के alumni द्वारा शुरू किया गया है, भारत का पहला प्राइवेट ग्लोबल सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन बना रहा है। कंपनी ने 2025 में $1.6 मिलियन प्री-सीड फंडिंग जुटाई और 125-150 LEO सैटेलाइट्स के साथ spoofing-proof, jamming-resistant सिग्नल देने का प्लान है। यह सेंटीमीटर-लेवल पोजीशनिंग और नैनोसेकंड टाइमिंग प्रदान करेगा, जो डिफेंस, फाइनेंस, टेलीकॉम और ऑटोनॉमस सिस्टम्स के लिए क्रांतिकारी होगा। इनडोर नेविगेशन भी संभव होगा, जो GPS में मुश्किल है।

Anti-Jamming और Resilient टेक्नोलॉजी स्टार्टअप्स anti-jamming सॉल्यूशंस पर फोकस कर रहे हैं, जैसे क्रिप्टोग्राफिक सिग्नल ऑथेंटिकेशन, मल्टी-फ्रीक्वेंसी रिसेप्शन और AI-बेस्ड इंटरफेरेंस डिटेक्शन। कुछ कंपनियां quantum-inspired navigation और magnetic field-based (MagNav) सिस्टम्स एक्सप्लोर कर रही हैं, जो सैटेलाइट सिग्नल पर निर्भर नहीं होते। VyomIC जैसी कंपनियां LEO से मजबूत सिग्नल पावर और फास्टर कन्वर्जेंस दे रही हैं। भारत में UAV और ऑटोनॉमस व्हीकल्स के लिए resilient GNSS प्रोटेक्शन सॉल्यूशंस विकसित हो रहे हैं।

ये प्रयास Atmanirbhar Bharat के तहत स्वदेशी टेक्नोलॉजी को मजबूत कर रहे हैं। स्टार्टअप्स और ISRO के सहयोग से भारत जल्द ही GPS जैसी विदेशी निर्भरता से मुक्त हो सकता है।

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