ब्रेंट क्रूड ऑयल कीमतों में तेज उछाल दिखाता ग्राफ, 73 से 103 डॉलर तक 15 दिनों में वृद्धि, पृष्ठभूमि में होर्मुज जलडमरूमध्य का नक्शा

तेल की कीमतों में आग: 15 दिन में 40% महंगा हुआ क्रूड ऑयल, 73 डॉलर से $103 पहुंचा; कहां तक पहुंच सकते हैं दाम?

**” पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें पिछले 15 दिनों में 40% से अधिक बढ़कर 73 डॉलर से 103 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य में रुकावट और आपूर्ति संकट से वैश्विक बाजार प्रभावित है, जबकि भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर महंगाई और आयात बिल का दबाव बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि तनाव जारी रहा तो कीमतें 120-150 डॉलर तक जा सकती हैं। “**

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में अभूतपूर्व उछाल देखने को मिल रहा है। अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष ने 28 फरवरी 2026 से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को बुरी तरह प्रभावित किया है। इस दौरान ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 27 फरवरी को लगभग 73 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 13 मार्च 2026 को 103.14 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई। यह 15 दिनों में 41% से अधिक की तेजी है, जो USD 30 प्रति बैरल की पूर्ण वृद्धि दर्शाती है।

संघर्ष के मुख्य कारणों में होर्मुज जलडमरूमध्य का आंशिक बंद होना शामिल है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का करीब 20% गुजरता है। ईरान की ओर से लगातार हमलों और जवाबी कार्रवाइयों ने टैंकर ट्रैफिक को प्रभावित किया है। खार्ग द्वीप जैसे प्रमुख निर्यात केंद्रों पर हमलों से ईरान की उत्पादन क्षमता घटी है, जबकि ओपेक+ देशों में उत्पादन समायोजन और वैकल्पिक मार्गों की तलाश जारी है।

भारत पर असर सबसे गहरा पड़ रहा है क्योंकि देश अपनी 85-90% कच्चे तेल की जरूरत आयात करता है, जिसमें से आधा से अधिक मध्य पूर्व से आता है। होर्मुज से गुजरने वाला 50% से अधिक आयात प्रभावित होने से आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान आया है। भारत के पास आपातकालीन भंडार मात्र 20-25 दिनों के लिए हैं, जिससे रिफाइनरियां उत्पादन घटाने को मजबूर हुई हैं।

वित्त वर्ष 2025 में भारत ने 137 अरब डॉलर में 24.3 करोड़ टन कच्चा तेल आयात किया था। चालू वित्त वर्ष के पहले 10 महीनों में 100 अरब डॉलर का आयात हो चुका है। यदि कीमतें 110-115 डॉलर पर बनी रहीं तो वित्त वर्ष 2027 में आयात बिल में 56-64 अर्ब डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।

प्रति 10 डॉलर की वृद्धि भारत की जीडीपी ग्रोथ को 0.5% तक कम कर सकती है, मुद्रास्फीति बढ़ा सकती है और रुपए पर दबाव डाल सकती है। फिलहाल सरकार ने पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढ़ाए हैं, क्योंकि घरेलू मुद्रास्फीति निचले स्तर पर है। लेकिन यदि ब्रेंट 130 डॉलर पार करता है तो ईंधन मूल्यों में बढ़ोतरी अपरिहार्य हो सकती है।

संभावित परिदृश्य और कीमतें

अल्पकालिक (अगले 1-3 महीने): यदि संघर्ष तेज हुआ तो ब्रेंट 120-150 डॉलर तक पहुंच सकता है, कुछ विश्लेषकों ने 200 डॉलर का अनुमान भी लगाया है।

मध्यमकालिक: रूस से आयात बढ़ाने, अमेरिकी प्रतिबंधों में ढील और वैकल्पिक स्रोतों (जैसे अमेरिका, अफ्रीका) से आपूर्ति से दबाव कम हो सकता है।

दीर्घकालिक: ओपेक+ उत्पादन बढ़ाने और वैश्विक मंदी के जोखिम से कीमतें 80-90 डॉलर पर स्थिर हो सकती हैं।

भारत के लिए प्रमुख प्रभाव

प्रभाव क्षेत्रसंभावित परिणामअनुमानित प्रभाव
आयात बिल50-65 अरब डॉलर अतिरिक्तFY27 में कुल बिल 180-200 अरब डॉलर+
मुद्रास्फीति30-50 आधार अंक वृद्धिईंधन से जुड़ी वस्तुओं में महंगाई
जीडीपी ग्रोथ0.5-1% की कमीविकास दर 6-7% तक प्रभावित
रुपया92-95 के स्तर पर कमजोरीडॉलर के मुकाबले दबाव
उद्योगपरिवहन, उर्वरक, प्लास्टिक में लागत वृद्धिउत्पादन घटाव संभव

वैश्विक बाजार में यह उछाल 2008 के बाद सबसे तेज में से एक है। भारत सरकार रूसी क्रूड पर निर्भरता बढ़ाने और घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहन देने की दिशा में कदम उठा रही है। लेकिन अल्पावधि में आपूर्ति संकट से बचना चुनौतीपूर्ण रहेगा। निवेशक और उपभोक्ता दोनों को ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव के लिए तैयार रहना चाहिए।

Disclaimer: यह लेख समाचार और विश्लेषण पर आधारित है। बाजार कीमतें अस्थिर हैं और भू-राजनीतिक घटनाओं पर निर्भर करती हैं। कोई निवेश सलाह नहीं है।

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