RBI मुख्यालय की इमारत और रुपया-डॉलर एक्सचेंज रेट ग्राफ

रुपये में गिरावट रोकने के लिए RBI ने खोले हाथ, विदेशी मुद्रा बाजार में 9.7 अरब डॉलर बेचे

“आरबीआई ने रुपये की गिरावट को थामने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में बड़े पैमाने पर हस्तक्षेप किया, जिसमें 9.7 अरब डॉलर की बिक्री शामिल है। इससे विदेशी मुद्रा भंडार में कमी आई, लेकिन रुपये को 91 के स्तर पर स्थिर करने में मदद मिली। वैश्विक अनिश्चितताओं और पूंजी निकासी के बीच यह कदम अर्थव्यवस्था पर असर डाल सकता है।”

आरबीआई ने हाल ही में रुपये की तेज गिरावट को रोकने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में सक्रिय हस्तक्षेप किया है। जनवरी के पहले सप्ताह में, केंद्रीय बैंक ने लगभग 9.7 अरब डॉलर की बिक्री की, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई। यह कदम वैश्विक जोखिमों, जैसे भू-राजनीतिक तनाव और विदेशी निवेशकों की निकासी के कारण उत्पन्न दबाव को कम करने के लिए उठाया गया। रुपये ने 91.74 के रिकॉर्ड निचले स्तर को छुआ, लेकिन आरबीआई के प्रयासों से यह 91.69 पर बंद हुआ।

विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति पर नजर डालें तो, 2 जनवरी को समाप्त सप्ताह में भंडार 9.809 अरब डॉलर घटकर 686.801 अरब डॉलर रह गया। इसमें विदेशी मुद्रा संपत्तियां 7.622 अरब डॉलर कम होकर 551.99 अरब डॉलर पर पहुंचीं। सोने के भंडार में भी 2.058 अरब डॉलर की गिरावट आई, जो अब 111.262 अरब डॉलर है। स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स 25 मिलियन डॉलर घटकर 18.778 अरब डॉलर हो गए, जबकि आईएमएफ के साथ रिजर्व पोजिशन 105 मिलियन डॉलर कम होकर 4.771 अरब डॉलर रही।

हालांकि, अगले सप्ताह में मामूली सुधार देखा गया। 9 जनवरी तक भंडार 392 मिलियन डॉलर बढ़कर 687.19 अरब डॉलर पहुंच गए। यह बढ़ोतरी आरबीआई के रणनीतिक कदमों का नतीजा है, जिसमें बॉन्ड खरीद और फॉरेक्स स्वैप शामिल हैं। कोटक महिंद्रा बैंक के अनुमान के अनुसार, अक्टूबर से अब तक आरबीआई ने रुपये को सहारा देने के लिए 45 अरब डॉलर खर्च किए हैं।

आरबीआई के हस्तक्षेप के तरीके में विविधता है। स्पॉट मार्केट में डॉलर बिक्री के अलावा, केंद्रीय बैंक ने USD/INR फॉरेक्स स्वैप का सहारा लिया। हालिया ऑपरेशन में मल्टीपल मैच्योरिटी पर बाय-सेल स्वैप किए गए, जो लिक्विडिटी मैनेजमेंट के लिए जरूरी हैं। ये कदम रुपये की अस्थिरता को नियंत्रित करने में मदद करते हैं, लेकिन डॉलर बिक्री से बैंकिंग सिस्टम में रुपये की लिक्विडिटी कम होती है।

वैश्विक कारकों ने रुपये पर दबाव बढ़ाया है। विदेशी निवेशकों ने जनवरी में भारतीय शेयरों से 3 अरब डॉलर निकाले, जबकि 2025 में रिकॉर्ड 19 अरब डॉलर की निकासी हुई। भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं, जैसे यूएस-यूरोप ट्रेड विवाद और ग्रीनलैंड संबंधी मुद्दे, ने सुरक्षित संपत्तियों की ओर निवेशकों को आकर्षित किया। इसके अलावा, कॉरपोरेट्स की हेजिंग डिमांड और मेटल इंपोर्टर्स की डॉलर मांग ने स्थिति को जटिल बनाया।

आरबीआई की नीति स्पष्ट है: बाजार को रुपये का स्तर तय करने दें, लेकिन अत्यधिक अस्थिरता को रोकें। गवर्नर संजय मल्होत्रा ने हालिया इंटरव्यू में कहा कि केंद्रीय बैंक का फोकस ऑर्डरली मूवमेंट पर है। हालांकि, हालिया सत्रों में आक्रामक हस्तक्षेप कम देखा गया, जो कॉरपोरेट्स की रीयल-मनी डिमांड को सहन करने की रणनीति दर्शाता है।

आरबीआई के हस्तक्षेप के प्रमुख प्रभाव:

आयात लागत में वृद्धि: रुपये की कमजोरी से आयात महंगे हो जाते हैं, खासकर कच्चे तेल और इलेक्ट्रॉनिक्स में। इससे मुद्रास्फीति बढ़ सकती है, जो पहले से ही 0% के करीब है।

निर्यात में लाभ: सस्ता रुपया निर्यातकों को फायदा देता है, जैसे आईटी और फार्मा सेक्टर में। रीयल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट सस्ता होने से प्रतिस्पर्धा बढ़ती है।

पूंजी बाजार पर असर: विदेशी निवेशकों की निकासी से इक्विटी मार्केट में गिरावट आती है, लेकिन आरबीआई की लिक्विडिटी इंजेक्शन से बॉन्ड मार्केट स्थिर रहता है।

बैंकिंग लिक्विडिटी: 2024 के अंत से 14.5 ट्रिलियन रुपये की लिक्विडिटी डाली गई, लेकिन सरप्लस 735 अरब रुपये तक सिमट गया।

विदेशी मुद्रा भंडार की तुलनात्मक स्थिति (अरब डॉलर में):

तिथिकुल भंडारविदेशी मुद्रा संपत्तिसोना भंडारएसडीआरआईएमएफ पोजिशन
2 जनवरी 2026686.801551.99111.26218.7784.771
9 जनवरी 2026687.19एन/एएन/एएन/एएन/ए
दिसंबर 2025 (अंत)696.61559.612113.3218.8034.876

यह तालिका दर्शाती है कि जनवरी के पहले सप्ताह में भंडार में तेज गिरावट आई, जो हस्तक्षेप का सीधा नतीजा है। आरबीआई के पास अभी भी मजबूत बफर है, जो आगे की चुनौतियों से निपटने में सक्षम है।

आरबीआई की रणनीति में आगे क्या? विशेषज्ञों का मानना है कि रुपये की गिरावट का पैटर्न स्तर से ज्यादा गति पर निर्भर करता है। यदि 91.07 के ऊपर ब्रेक होता है, तो 91.70-92.00 की ओर बढ़ सकता है, जब तक आरबीआई सक्रिय नहीं रहता। नीचे की ओर, 90.30-90.50 पर सपोर्ट है। 2026 में डॉलर की कमजोरी के बावजूद, रुपये पर स्थानीय कारकों का असर रहेगा, जैसे आरबीआई की दर कटौती और लिक्विडिटी मैनेजमेंट।

केंद्रीय बैंक ने हालिया महीनों में अपनी क्षमता का परीक्षण किया है। यदि दबाव जारी रहा, तो आरबीआई को दरों, लिक्विडिटी और हस्तक्षेप के बीच संतुलन बनाना होगा। विदेशी निवेशकों की निकासी और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच, यह कदम अर्थव्यवस्था की स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है।

आरबीआई हस्तक्षेप के ऐतिहासिक संदर्भ:

अक्टूबर 2025: 11.88 अरब डॉलर बेचे।

दिसंबर 2025: 3-वर्षीय USD/INR बाय-सेल स्वैप पर मजबूत डिमांड।

जनवरी 2026: मल्टीपल मैच्योरिटी स्वैप के जरिए लिक्विडिटी मैनेजमेंट।

ये उदाहरण दर्शाते हैं कि आरबीआई की टूलकिट विविध है, जो स्पॉट, फॉरवर्ड और स्वैप मार्केट को कवर करती है। इससे न केवल रुपये को सहारा मिलता है, बल्कि अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों पर असर को न्यूनतम रखा जाता है।

आरबीआई के प्रयासों से रुपये में स्थिरता आई है, लेकिन वैश्विक कारक अभी भी जोखिम बने हुए हैं। यदि ट्रेड डील में देरी हुई या भू-राजनीतिक तनाव बढ़ा, तो आगे हस्तक्षेप की जरूरत पड़ सकती है।

Disclaimer: This is based on news reports and economic tips from various sources.

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